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वन पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रेम्णा वृत्रशत्रुरर्जुनस्य शुभं मुखम् |  २३   क
पस्पर्श पुण्यगन्धेन करेण परिसान्त्वय़न् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति