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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
असौ हि चन्द्रमाः क्षीणः किञ्चिच्छेषो हि लक्ष्यते |  ६४   क
क्षय़ाच्चैवास्य देवेश प्रजाश्चापि गताः क्षय़म् ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति