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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
श्राद्धे दैवे च पुरुषा ये च नित्यं धृतव्रताः |  २४   क
तेऽपि लोभसमाय़ुक्ता भोक्ष्यन्तीह परस्परम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति