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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
विश्वकर्मकृता चास्य दिव्या माला हिरण्मय़ी |  २५   क
आवद्धा त्रिपुरघ्नेन स्वय़मेव यशस्विना ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति