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भीष्म पर्व
अध्याय ११३
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सञ्जय़ उवाच
अभिमन्युश्च समरे द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः |  ४३   क
दुद्रुवुः समरे भीष्मं समुद्यतमहाय़ुधाः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति