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भीष्म पर्व
अध्याय ११३
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सञ्जय़ उवाच
ते वराश्वरथव्रातैर्वारणैः सपदातिभिः |  ४८   क
तमेकं छादय़ामासुर्मेघा इव दिवाकरम् |  ४८   ख
भीष्मं भागीरथीपुत्रं प्रतपन्तं रणे रिपून् ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति