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भीष्म पर्व
अध्याय ११३
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सञ्जय़ उवाच
ततः शल्यः कृपश्चैव चित्रसेनश्च भारत |  ५   क
दुःशासनो विकर्णश्च रथानास्थाय़ सत्वराः |  ५   ख
पाण्डवानां रणे शूरा ध्वजिनीं समकम्पय़न् ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति