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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
व्यवसाय़द्वितीय़ोऽहं मनसा भारमुद्वहन् |  २८   क
गर्जामि यद्यहं विप्र तव किं तत्र नश्यति ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति