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द्रोण पर्व
अध्याय ११३
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सञ्जय़ उवाच
सुवर्णविकृतैश्चापि गदामुसलपट्टिशैः |  २०   क
वज्रैश्च विविधाकारैः शक्तिभिः परिघैरपि |  २०   ख
शतघ्नीभिश्च चित्राभिर्वभौ भारत मेदिनी ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति