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द्रोण पर्व
अध्याय ११३
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सञ्जय़ उवाच
अचिन्त्यमद्भुतं चैव तय़ोः कर्मातिमानुषम् |  २४   क
दृष्ट्वा चारणसिद्धानां विस्मय़ः समपद्यत ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति