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विराट पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वरमाणः शरानस्यन्पाण्डवः स वभौ रणे |  ५   क
मध्यन्दिनगतोऽर्चिष्माञ्शरदीव दिवाकरः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति