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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भृगुरु उवाच
एवं सर्वेषु भूतेषु गूढश्चरति संवृतः |  २७   क
दृश्यते त्वग्र्यया वुद्ध्या सूक्ष्मय़ा तत्त्वदर्शिभिः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति