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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत्स्यात्कुरुनन्दन |  ५८   क
अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतैः |  ५८   ख
भवेत्कृतय़ुगप्राप्तिराशीःकर्मविवर्जितैः ||  ५८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति