आदि पर्व  अध्याय ११४

वैशम्पाय़न उवाच

व्रह्मचारी वहुगुणः सुपर्णश्चेति विश्रुतः |  ४७   क
विश्वावसुर्भुमन्युश्च सुचन्द्रो दशमस्तथा ||  ४७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति