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आदि पर्व
अध्याय ११४
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वैशम्पाय़न उवाच
काम्या शारद्वती चैव ननृतुस्तत्र सङ्घशः |  ५३   क
मेनका सहजन्या च पर्णिका पुञ्जिकस्थला ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति