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आदि पर्व
अध्याय ११४
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वैशम्पाय़न उवाच
मृगव्याधश्च शर्वश्च निरृतिश्च महाय़शाः |  ५७   क
अजैकपादहिर्वुध्न्यः पिनाकी च परन्तपः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति