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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
पञ्चविंशतिकस्यास्य योऽय़ं देहेषु वर्तते |  २४   क
एष मोक्षय़ितव्येति प्राहुरव्यक्तगोचरात् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति