आदि पर्व  अध्याय ५७

वैशम्पाय़न उवाच

ततो योजनगन्धेति तस्या नाम परिश्रुतम् |  ६८   क
पराशरोऽपि भगवाञ्जगाम स्वं निवेशनम् ||  ६८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति