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अनुशासन पर्व
अध्याय ११४
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वृहस्पतिरु उवाच
हन्त निःश्रेय़सं जन्तोरहं वक्ष्याम्यनुत्तमम् |  ३   क
अहिंसापाश्रय़ं धर्मं यः साधय़ति वै नरः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति