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द्रोण पर्व
अध्याय १०५
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द्रोण उवाच
तद्गरीय़स्तरं मन्ये यत्र कृष्णधनञ्जय़ौ |  १२   क
सा पुरस्ताच्च पश्चाच्च गृहीता भारती चमूः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति