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अनुशासन पर्व
अध्याय ११४
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वृहस्पतिरु उवाच
अहिंसकानि भूतानि दण्डेन विनिहन्ति यः |  ५   क
आत्मनः सुखमन्विच्छन्न स प्रेत्य सुखी भवेत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति