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अनुशासन पर्व
अध्याय ११४
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वृहस्पतिरु उवाच
आत्मोपमश्च भूतेषु यो वै भवति पूरुषः |  ६   क
न्यस्तदण्डो जितक्रोधः स प्रेत्य सुखमेधते ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति