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वन पर्व
अध्याय २०
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वासुदेव उवाच
दारुकस्य सुतस्तं तु वाणवेगमचिन्तय़न् |  १३   क
भूय़ एव महावाहो प्रय़यौ हय़संमतः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति