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वन पर्व
अध्याय ११४
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वैशम्पाय़न उवाच
स सागरं समासाद्य गङ्गाय़ाः सङ्गमे नृप |  २   क
नदीशतानां पञ्चानां मध्ये चक्रे समाप्लवम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति