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वन पर्व
अध्याय ११४
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लोमश उवाच
ऋषिभिः समुपाय़ुक्तं यज्ञिय़ं गिरिशोभितम् |  ५   क
उत्तरं तीरमेतद्धि सततं द्विजसेवितम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति