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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
नृपा दुर्योधनमुखा निःश्वस्य रुरुदुस्ततः |  १०३   क
विषादाच्च चिरं कालमतिष्ठन्विगतेन्द्रिय़ाः ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति