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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
प्राक्रोशन्प्रापतंश्चान्ये जग्मुर्मोहं तथापरे |  ११०   क
क्षत्रं चान्येऽभ्यनिन्दन्त भीष्मं चैकेऽभ्यपूजय़न् ||  ११०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति