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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
महोपनिषदं चैव योगमास्थाय़ वीर्यवान् |  ११२   क
जपञ्शान्तनवो धीमान्कालाकाङ्क्षी स्थितोऽभवत् ||  ११२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति