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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ोपगूढस्य च मे निद्रय़ापहृतं मनः |  ६९   क
ततोऽपश्यं तमो घोरं पुरुषं च महौजसम् ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति