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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
स विशीर्णतनुत्राणः पीडितो वहुभिस्तदा |  ४   क
विव्यथे नैव गाङ्गेय़ो भिद्यमानेषु मर्मसु ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति