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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादत्त गाङ्गेय़ो वलवत्तरम् |  ४८   क
तदप्यस्य शितैर्भल्लैस्त्रिधा त्रिभिरुपानुदत् |  ४८   ख
निमेषान्तरमात्रेण आत्तमात्तं महारणे ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति