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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
एवमस्य धनूंष्याजौ चिच्छेद सुवहून्यपि |  ४९   क
ततः शान्तनवो भीष्मो वीभत्सुं नाभ्यवर्तत ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति