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सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
येषामर्थाय़ पापस्य धिग्जय़स्य सुहृद्वधे |  १४   क
निर्जितैरप्रमत्तैर्हि विजिता जितकाशिनः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति