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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
रश्मींस्तेषां स मनसा यदा सम्यङ्निय़च्छति |  ४४   क
तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति