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उद्योग पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
दुःशासनौघं शलशल्यमत्स्यं; सुषेणचित्राय़ुधनागनक्रम् |  ३९   क
जय़द्रथाद्रिं पुरुमित्रगाधं; दुर्मर्षणोदं शकुनिप्रपातम् ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति