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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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व्राह्मण उवाच
इत्युक्तः स तदा कृष्ण मय़ा शिष्यो महातपाः |  ४८   क
अगच्छत यथाकामं व्राह्मणश्छिन्नसंशय़ः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति