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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
स पपात महावाहुर्वसुधामनुनादय़न् |  ८४   क
इन्द्रध्वज इवोत्सृष्टः केतुः सर्वधनुष्मताम् |  ८४   ख
धरणीं नास्पृशच्चापि शरसङ्घैः समाचितः ||  ८४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति