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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
शरतल्पे महेष्वासं शय़ानं पुरुषर्षभम् |  ८५   क
रथात्प्रपतितं चैनं दिव्यो भावः समाविशत् ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति