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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
ते तु भीष्मं समासाद्य मुनय़ो हंसरूपिणः |  ९२   क
अपश्यञ्शरतल्पस्थं भीष्मं कुरुपितामहम् ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति