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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
स वध्यमानः सङ्क्रुद्धः समुत्तस्थौ महावलः |  २३   क
क्रुद्धश्चाभक्षय़त्तेषां शस्त्राणि विविधानि च ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति