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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
जीमूताविव चान्योन्यं तौ ववर्षतुराहवे |  १३   क
तलशव्दरवैश्चैव त्रासय़न्तौ परस्परम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति