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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
शरजालैश्च विविधैश्छादय़ामासतुर्मृधे |  १४   क
अन्योन्यं समरे क्रुद्धौ कृतप्रतिकृतैषिणौ ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति