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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
ततो भीमो महावाहू राधेय़स्य महात्मनः |  १५   क
क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा कर्णं विव्याध पत्रिणा ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति