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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
हस्त्यश्वनरदेहांश्च गतासून्प्रेक्ष्य सर्वतः |  १८   क
सूतपुत्रस्य संरम्भाद्दीप्तं वपुरजाय़त ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति