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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
मरीचिविकचस्येव राजन्भानुमतो वपुः |  २१   क
आसीदाधिरथेर्घोरं वपुः शरशतार्चिषः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति