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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
अग्निचक्रोपमं घोरं मण्डलीकृतमाय़ुधम् |  २३   क
कर्णस्यासीन्महाराज सव्यदक्षिणमस्यतः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति