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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
स्वर्णपुङ्खाः सुनिशिताः कर्णचापच्युताः शराः |  २४   क
प्राच्छादय़न्महाराज दिशः सूर्यस्य च प्रभाम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति