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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
तेषु क्रोधाग्निदग्धेषु तदा भरतसत्तम |  २६   क
तं प्रवुद्धं महात्मानं कुम्भकर्णमिवापरम् |  २६   ख
आससाद महातेजाः कुवलाश्वो महीपतिः ||  २६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति