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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
ते तु चापवलोद्धूताः शातकुम्भविभूषिताः |  २८   क
अजस्रमन्वकीर्यन्त शराः पार्थरथं प्रति ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति