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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
ते व्योम्नि रत्नविकृता व्यकाशन्त सहस्रशः |  २९   क
शलभानामिव व्राताः शराः कर्णसमीरिताः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति